24 अक्टूबर 2026 |
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एक देश एक पहचान के बाद भी केवाईसी के नाम पर जनता परेशान

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OM Darpan

Sep 01, 2026 08:20 pm 807 views
एक देश एक पहचान के बाद भी केवाईसी के नाम पर जनता परेशान
  नई दिल्ली। भारत में डिजिटल पहचान व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य नागरिकों को बार-बार दस्तावेज जमा करने की परेशानी से मुक्त करना था। इसके उलट वर्तमान में बैंक, गैस, राशन और पैन जैसी सेवाओं में केवाईसी की अलग-अलग प्रक्रियाएं आम नागरिक के लिए बड़ी मुसीबत बनती जा रही हैं। जब आधार के माध्यम से पहचान की डिजिटल पुष्टि ऑनलाइन की जा सकती है, तब हर संस्था को अलग-अलग तरीके से वही जानकारी जुटाने की जरूरत पर सवाल उठ रहे हैं। इस दोहरी प्रक्रिया से लोगों को आर्थिक और मानसिक कष्ट झेलना पड़ रहा है। यूआइडीएआइ के अनुसार अधिकृत संस्थाएं आधार ऑथेंटिकेशन का इस्तेमाल कर सकती हैं। ई-केवाईसी की सुविधा ओटीपी अथवा बायोमेट्रिक माध्यम से उपलब्ध है। इसके बावजूद बैंक, गैस कंपनी और सार्वजनिक वितरण प्रणाली ने सत्यापन के अलग-अलग दरवाजे खोल रखे हैं।

गैस एजेंसी और राशन दुकान पर अलग सत्यापन

बैंकिंग व्यवस्था में आरबीआई के नियमों के तहत संस्थाओं को ग्राहक की जानकारी केंद्रीय रजिस्ट्री यानी सीकेवाईसीआर में देनी होती है। इसका मकसद ग्राहक को बार-बार जानकारी देने से मुक्ति दिलाना था, लेकिन व्यवहार में ग्राहक को हर केंद्र पर अलग सत्यापन का सामना करना पड़ता है। मोबाइल नंबर, पता या बायोमेट्रिक मिलान में मामूली अंतर होने से पूरी प्रक्रिया अटक जाती है। गरीब और मजदूर वर्ग के लिए यह केवल तकनीकी समस्या नहीं है, बल्कि केवाईसी के लिए उन्हें अपना काम-धंधा छोड़ना पड़ता है। आने-जाने का किराया और घंटों लाइन में खड़े होने से उनका आर्थिक आधार प्रभावित हो रहा है।

फर्जी लाभार्थियों को रोकने के नाम पर तालमेल का अभाव

आयकर विभाग के अनुसार पैन-आधार से जुड़ी समस्याओं के लिए प्रोटीन और यूटीआईआईटीएसएल केंद्रों पर बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण की सुविधा है। एलपीजी और राशन व्यवस्था में भी फर्जी लाभार्थियों को रोकने के लिए डिजिटल सत्यापन किया जाता है, लेकिन इन तकनीकी प्रणालियों में आपसी तालमेल की कमी है। केवाईसी के लिए निजी कंपनियों की सेवाएं लेने से डेटा सुरक्षा पर भी सवाल उठ रहे हैं। नागरिक को यह जानकारी नहीं मिल पाती कि उसका डेटा कहां जा रहा है और किस आधार पर उसकी केवाईसी असफल हुई है। आधार का इंफ्रास्ट्रक्चर वास्तविक समय में पहचान सत्यापित करने में सक्षम है, फिर भी संस्थाएं अपना अलग डेटाबेस बना रही हैं।

केवाईसी के नाम पर वसूली का नया अभियान

केंद्र सरकार के सामने अब बड़ा नीतिगत सवाल है कि क्या हर संस्था का अपना अलग डेटाबेस होना चाहिए या नागरिक की सहमति से एक मानकीकृत डिजिटल केवाईसी पर्याप्त है। जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जहां आधार आधारित प्रमाणीकरण और सीकेवाईसी आपस में जुड़े हों। तकनीक का उद्देश्य जनता के समय और श्रम की बचत करना होना चाहिए। यदि सुधार नहीं हुआ तो डिजिटल पहचान ही नागरिक के लिए बार-बार दस्तावेज साबित करने की सबसे बड़ी मजबूरी बन जाएगी। वर्तमान में हर संस्था द्वारा अलग केवाईसी के नाम पर लोगों को भटकाकर वसूली का नया अभियान शुरू हो गया है।

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